ग़ज़ल
फुहारों वाली बारिश
जाने, किधर सेचुपचाप आकरहाथी सामने लेट गए हैं,जाने किधर सेचुपचाप आकरहाथी सामने बैठ गए हैं !पहाड़ों-जैसेअति विशाल आयतनोंवालेपाँच-सात हाथीसामने--बिल्कुल निकटजम गए हैंइनका परिमण्डलहमें बार-बार ललचाता रहेगाछिड़ने-छेड़ने के लिएसदैव बुलावा देता रहेगा !
लो, ये गिरी-कुंजरऔर भी विशाल होने लगे !लो, ये दूर हट गए,लो, ये और भी पास आ रहे,लो, इनका लीलाधरी रूपऔर भी फैलता जा रहा,लेकिन, ये गुमसुम क्यों हैं ?अरे, इन्होंने तोढक लिया अपने आपकोहल्की-पतली पारदर्शी चादरों सेझीने-झीने, 'लूज'झीनी-झीनी, लूज बिनावटवालीवो मटमैली ओढ़नीबादलों को ढक लेगी अबअब फुहारोंवाली बारिश होगीबड़ी-बड़ी बूँदें तो यहशायद कल बरसेंगे...शायद परसों...शायद हफ़्ता बाद...
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