ग़ज़ल

कल और आज

नागार्जुन · सब कलाम देखें
अभी कल तकगालियॉं देती तुम्‍हेंहताश खेतिहर,अभी कल तकधूल में नहाते थेगोरैयों के झुंड,अभी कल तकपथराई हुई थीधनहर खेतों की माटी,अभी कल तकधरती की कोख मेंदुबके पेड़ थे मेंढक,अभी कल तकउदास और बदरंग था आसमान!
और आजऊपर-ही-ऊपर तन गए हैंतम्हारे तंबू,और आजछमका रही है पावस रानीबूँदा-बूँदियों की अपनी पायल,और आजचालू हो गई हैझींगुरो की शहनाई अविराम,और आजज़ोरों से कूक पड़ेनाचते थिरकते मोर,और आजआ गई वापस जानदूब की झुलसी शिराओं के अंदर,और आज विदा हुआ चुपचाप ग्रीष्मसमेटकर अपने लाव-लश्कर।
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