ग़ज़ल

तन गई रीढ़

नागार्जुन · सब कलाम देखें
झुकी पीठ को मिलाकिसी हथेली का स्पर्शतन गई रीढ़
महसूस हुई कन्धों कोपीछे से,किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसेंतन गई रीढ़
कौंधी कहीं चितवनरंग गए कहीं किसी के होठनिगाहों के ज़रिये जादू घुसा अन्दरतन गई रीढ़
गूँजी कहीं खिलखिलाहटटूक-टूक होकर छितराया सन्नाटाभर गए कर्णकुहरतन गई रीढ़
आगे से आयाअलकों के तैलाक्त परिमल का झोंकारग-रग में दौड़ गई बिजलीतन गई रीढ़
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