ग़ज़ल

अग्निबीज

नागार्जुन · सब कलाम देखें
अग्निबीजतुमने बोए थेरमे जूझते,युग के बहु आयामीसपनों में, प्रियखोए थे !अग्निबीजतुमने बोए थे
तब के वे साथीक्या से क्या हो गएकर दिया क्या से क्या तो,देख–देखप्रतिरूपी छवियाँपहले खीझेफिर रोए थेअग्निबीजतुमने बोए थे
ऋषि की दृष्टिमिली थी सचमुचभारतीय आत्मा थे तुम तोलाभ–लोभ की हीन भावनापास न फटकीअपनों की यह ओछी नीयतप्रतिपल हीकाँटों–सी खटकीस्वेच्छावश तुमशरशैया पर लेट गए थेलेकिन उन पतले होठों परमुस्कानों की आभा भी तोकभी–कभी खेला करती थी !यही फूल की अभिलाषा थीनिश्चय¸ तुम तोइस 'जन–युग' केबोधिसत्व थे;पारमिता में त्याग तत्व थे।
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