गोपाल सिंह नेपाली

गोपाल सिंह नेपाली

1911-1963
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैंखो न सका
आ रहे तुम बन कर मधुमासऔर मैं ऋतु का पहला फूल
उस पार कहीं बिजली चमकी होगीजो झलक उठा है मेरा भी आँगन ।
अफ़सोस नहीं इसका हमको, जीवन में हम कुछ कर न सके,झोलियाँ किसी की भर न सके, सन्ताप किसी का हर न सके,
ओ दुपट्टा रंग दे मेरा रंगरेजहो गयी सरसों पीली-पीली
कर्णधार तू बना तो हाथ में लगाम लेक्रांति को सफल बना नसीब का न नाम ले
कहाँ तेरी मंज़िल कहाँ है ठिकानामुसाफ़िर बता दे कहाँ तुझको जाना
कितना कोमल,कितना वत्सल,
हाय किसी से मेरी प्रीत लगीअब क्या करूँ
कुछ ऐसा खेल रचो साथी!कुछ जीने का आनंद मिले
झुप्रोमा बस्नेमाथि पनि त्रिभुवनको मनमा प्यार छउनी राजमहलमा बसे पनि घर-घरमा जय-जयकार छ
तारे चमके, तुम भी चमको, अब बीती रात न लौटेगी,लौटी भी तो एक दिन फिर यह, हम दो के साथ न लौटेगी ।
तुम आग पर चलो जवान, आग पर चलोतुम आग पर चलो
तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पनारात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
तू चिंगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूँ,तू बन जा हहराती गँगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँतू चलती है पन्ने-पन्ने, मैं लोचन-लोचन बढ़ता हूँ
म सम्झंछु, तिमीले सम्झे, झन् मेरो मन कस्तो होला ?तिम्रो मनमा बस्न पाए, हाम्रो जीवन कस्तो होला ?
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे ।।मंदिर-मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न दीखे सूरत तेरी ।
दिल चुरा कर न हमको बुलाया करोगुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
तन का दिया, प्राण की बाती,दीपक जलता रहा रात-भर ।
दूर जाकर न कोई बिसारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे,यूँ बिछड़ कर न रतियाँ गुज़ारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।
दूर पपीहा बोला रात आधी रह गईमेरी तुम्हारी मुलाक़ात बाक़ी रह गई
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले ।भौंरों को देख उड़े भौरें, कलियों को देख हँसी कलियाँ,
न जाने कैसी बुरी घड़ी में, दुल्हन बनी एक अभागनपिया की अर्थी लेकर चली होने सती सुहागन
घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी हैउस ओर ग्राम इस ओर नगर, चंहु ओर नजरिया प्यासी है
निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिएतुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रहीएक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का
प्रिये तुम्हारी इन आँखों में मेरा जीवन बोल रहा हैबोले मधुप फूल की बोली, बोले चाँद समझ लें तारे
बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटामेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा
बहारें आएँगी, होंठों पे फूल खिलेंगेसितारों को मालूम था, हम दोनों मिलेंगे
बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रेदाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे
ओडारसित, सोधें, “मान्छे कहाँ गयो ओडार ?”ओडारले भन्यो, “कुन्नि तलतिर ओर्ल्हेको मात्तै म जान्दछु ।“
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीलीनीले नभ में बादल काले, हरियाली में सरसों पीली
राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लममेरा धन है स्वाधीन क़लम
मेरी चुनरी उड़ाए लियो जाएउड़ाए लियो जाए फुलवारी की ठण्डी हवा
मैं प्यासा भृंग जनम भर काफिर मेरी प्यास बुझाए क्या,
मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ::नील गगन में पंख पसारूँ;
घोर अंधकार हो,चल रही बयार हो,
यह लघु सरिता का बहता जलकितना शीतल, कितना निर्मल
यहाँ रात किसी की रोते कटे, या चैन से सोते-सोते कटेतक़दीर में कैसी रात मेरी, न सोते कटे न रोते कटे
अरे युगांतर, आ जल्दी अब खोल, खोल मेरा बंधनबंधा हुआ इन जंजीरों से तड़प रहा कब से जीवन
झिरमीर- झिरमीर पानी पर्छझिरमीर- झिरमीर पानी पर्छ ।।१।।
ओ मृगनैनी, ओ पिक बैनी,तेरे सामने बाँसुरिया झूठी है!
शमा से कोई कह दे कि तेरे रहते-रहते अँधेरा हो रहाकि तुम हो वहाँ तो मिलने को यहाँ पतंगा रो रहा
शासन चलता तलवार सेओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ।
घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,आज द्वार- द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
दो वर्तमान का सत्‍य सरल,सुंदर भविष्‍य के सपने दो
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।(1)
शंकर की पुरी, चीन ने सेना को उताराचालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा