ग़ज़ल

प्रिये तुम्हारी इन आँखों में

गोपाल सिंह नेपाली · सब कलाम देखें
प्रिये तुम्हारी इन आँखों में मेरा जीवन बोल रहा है
बोले मधुप फूल की बोली, बोले चाँद समझ लें तारेगा-गाकर मधुगीत प्रीति के, सिंधु किसी के चरण पखारेयह पापी भी क्यों-न तुम्हारा मनमोहम मुख-चंद्र निहारेप्रिये तुम्हारी इन आँखों में मेरा जीवन बोल रहा है
देखा मैंने एक बूँद से ढँका जरा आँखों का कोनाथी मन में कुछ पीर तुम्हारे, पर न कहीं कुछ रोना धोनामेरे लिय बहुत काफी है आँखों का यह डब-डब होनासाथ तुम्हारी एक बूँद के, मेरा जीवन डोल रहा है
कोई होगी और गगन में, तारक-दीप जलाने वालीकोई होगी और, फूल में सुंदर चित्र बनाने वालीतुम न चाँदनी, तुम न अमावस, सखी तुम तो ऊषा की लालीयह दिल खोल तुम्हारा हँसना, मेरा बंधन खोल रहा है
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