ग़ज़ल
वसंत गीत
ओ मृगनैनी, ओ पिक बैनी,तेरे सामने बाँसुरिया झूठी है!रग-रग में इतना रंग भरा,कि रंगीन चुनरिया झूठी है!
मुख भी तेरा इतना गोरा,बिना चाँद का है पूनम!है दरस-परस इतना शीतल,शरीर नहीं है शबनम!अलकें-पलकें इतनी काली,घनश्याम बदरिया झूठी है!
रग-रग में इतना रंग भरा,कि रंगीन चुनरिया झूठी ह !क्या होड़ करें चन्दा तेरी,काली सूरत धब्बे वाली!कहने को जग को भला-बुरा,तू हँसती और लजाती!मौसम सच्चा तू सच्ची है,यह सकल बदरिया झूठी है!
रग-रग में इतना रंग भरा,कि रंगीन चुनरिया झूठी है!
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