ग़ज़ल

उस पार

गोपाल सिंह नेपाली · सब कलाम देखें
उस पार कहीं बिजली चमकी होगीजो झलक उठा है मेरा भी आँगन ।
उन मेघों में जीवन उमड़ा होगाउन झोंकों में यौवन घुमड़ा होगाउन बूँदों में तूफ़ान उठा होगाकुछ बनने का सामान जुटा होगाउस पार कहीं बिजली चमकी होगीजो झलक उठा है मेरा भी आँगन ।
तप रही धरा यह प्यासी भी होगीफिर चारों ओर उदासी भी होगीप्यासे जग ने माँगा होगा पानीकरता होगा सावन आनाकानीउस ओर कहीं छाए होंगे बादलजो भर-भर आए मेरे भी लोचन ।
मैं नई-नई कलियों में खिलता हूँसिरहन बनकर पत्तों में हिलता हूँपरिमल बनकर झोंकों में मिलता हूँझोंका बनकर झोंकों में मिलता हूँउस झुरमुट में बोली होगी कोयलजो झूम उठा है मेरा भी मधुबन ।
मैं उठी लहर की भरी जवानी हूँमैं मिट जाने की नई कहानी हूँमेरा स्वर गूँजा है तूफ़ानों मेंमेरा जीवन आज़ाद तरानों मेंऊँचे स्वर में गरजा होगा सागरखुल गए भँवर में लहरों के बंधन ।
मैं गाता हूँ जीवन की सुंदरतायौवन का यश भी मैं गाया करतामधु बरसाती मेरी वाणी-वीणाबाँटा करती समता-ममता-करुणापर आज कहीं कोई रोया होगाजो करती वीणा क्रंदन ही क्रंदन ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.