ग़ज़ल
न जाने कैसी बुरी घड़ी में दुल्हन बनी एक अभागन
न जाने कैसी बुरी घड़ी में, दुल्हन बनी एक अभागनपिया की अर्थी लेकर चली होने सती सुहागन
अर्थी नहीं नारी का सुहाग जा रहा हैभगवान तेरे घर का सिंगार जा रहा है
बजता था जीवन का गीत, दो साँसों के तारों मेंटूटा है जिसका तार, वो सितार जा रहा हैभगवान तेरे घर का...
जलता था, जब तक जलती रही चिंगारीबुझने को अब तन का, अंगार जा रहा हैभगवान तेरे घर का...
भव सागर की लहरों में, बिछड़े ऐसे दो साथीसजनी मँझधार, साजन उस पार जा रहा हैभगवान तेरे घर का...
(1953) फ़िल्म 'नाग पंचमी'
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