ग़ज़ल
यह दिया बुझे नहीं
घोर अंधकार हो,चल रही बयार हो,आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहींयह निशीथ का दिया ला रहा विहान है ।
शक्ति का दिया हुआ,शक्ति को दिया हुआ,भक्ति से दिया हुआ,यह स्वतंत्रता–दिया,रूक रही न नाव होजोर का बहाव हो,आज गंग–धार पर यह दिया बुझे नहीं,यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है ।
यह अतीत कल्पना,यह विनीत प्रार्थना,यह पुनीत भावना,यह अनंत साधना,शांति हो, अशांति हो,युद्ध¸ संधि¸ क्रांति हो,तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं,देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है ।
तीन–चार फूल है,आस–पास धूल है,बांस है –बबूल है,घास के दुकूल है,वायु भी हिलोर दे,फूंक दे¸ चकोर दे,कब्र पर मजार पर, यह दिया बुझे नहीं,यह किसी शहीद का पुण्य–प्राण दान है।
झूम–झूम बदलियाँचूम–चूम बिजलियाँआंधिया उठा रहींहलचलें मचा रहींलड़ रहा स्वदेश हो,यातना विशेष हो,क्षुद्र जीत–हार पर¸ यह दिया बुझे नहीं,यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.