ग़ज़ल

दीपक जलता रहा रातभर

गोपाल सिंह नेपाली · सब कलाम देखें
तन का दिया, प्राण की बाती,दीपक जलता रहा रात-भर ।
दु:ख की घनी बनी अँधियारी,सुख के टिमटिम दूर सितारे,उठती रही पीर की बदली,मन के पंछी उड़-उड़ हारे ।
बची रही प्रिय की आँखों से,मेरी कुटिया एक किनारे,मिलता रहा स्नेह रस थोडा,दीपक जलता रहा रात-भर ।
दुनिया देखी भी अनदेखी,नगर न जाना, डगर न जानी;रंग देखा, रूप न देखा,केवल बोली ही पहचानी,
कोई भी तो साथ नहीं था,साथी था ऑंखों का पानी,सूनी डगर सितारे टिमटिम,पंथी चलता रहा रात-भर ।
अगणित तारों के प्रकाश में,मैं अपने पथ पर चलता था,मैंने देखा, गगन-गली में,चाँद-सितारों को छलता था ।
आँधी में, तूफ़ानों में भी,प्राण-दीप मेरा जलता था,कोई छली खेल में मेरी,दिशा बदलता रहा रात-भर ।
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