ग़ज़ल
कर्णधार तू बना तो
कर्णधार तू बना तो हाथ में लगाम लेक्रांति को सफल बना नसीब का न नाम ले
भेद सर उठा रहा मनुष्य को मिटा रहागिर रहा समाज आज बाजुओं में थाम ले
त्याग का न दाम लेदे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले
यह स्वतन्त्रता नहीं कि एक तो अमीर होदूसरा मनुष्य तो रहे मगर फकीर हो
न्याय हो तो आरपार एक ही लकीर होवर्ग की तनातनी न मानती है चांदनी
चांदनी लिये चला तो घूम हर मुकाम लेत्याग का न दाम लेदे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले
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