ग़ज़ल
कहाँ तेरी मंज़िल कहाँ है ठिकाना
कहाँ तेरी मंज़िल कहाँ है ठिकानामुसाफ़िर बता दे कहाँ तुझको जानाकहाँ तेरी मंज़िल ...
गगन में उड़ने वालों का भी गुलशन रैन-बसेरा हैघर की ओर चले राही तो धुँधली शाम सवेरा हैसूरज-चाँद-सितारे हैं तो उनकी भी मंज़िल हैमंज़िल है तो जहाँ भी जाए राह तेरी झिलमिल हैबिन मंज़िल बेकार है ग़ाफ़िल, क़दम भी उठानामुसाफ़िर बता दे...
(1959) फ़िल्म 'नई राहें'
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