ग़ज़ल
तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे
तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पनारात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
चाँद घूँघट घटा का उठाता रहाद्वार घर का पवन खटखटाता रहापास आते हुए तुम कहीं छुप गएगीत हमको पपीहा रटाता रहा
तुम कहीं रह गये, हम कहीं रह गए, गुनगुनाती रही वेदनारात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
तुम न आए, हमें ही बुलाना पड़ामंदिरों में सुबह-शाम जाना पड़ालाख बातें कहीं मूर्तियाँ चुप रहींबस तुम्हारे लिए सर झुकाता रहा
प्यार लेकिन वहाँ एकतरफ़ा रहा, लौट आती रही प्रार्थनारात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
शाम को तुम सितारे सजाते चलेरात को मुँह सुबह का दिखाते चलेपर दिया प्यार का, काँपता रह गयातुम बुझाते चले, हम जलाते चले
दुख यही है हमें तुम रहे सामने, पर न होता रहा सामनारात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना
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