ग़ज़ल
मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ
मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ::नील गगन में पंख पसारूँ;दुःख है, तुमसे बिछड़ गया हूँ::किन्तु तुम्हारी सुधि न बिसारूँ!
उलझन में दुःख में वियोग में::अब तुम याद बहुत आती हो;घनी घटा में तुमको खोजूँ::मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ;
जब से बिछुड़े हैं हम दोनों::मति-गति मेरी बदल गई है;पावस में हिम में बसंत में::हँसते-रोते तुम्हें पुकारूँ!
तब तक मन मंदिर में मेरे::होती रहे तुम्हारी पग-ध्वनि;तब तक उत्साहित हूँ, बाजी::इस जीवन की कभी न हारूँ!
तुम हो दूर दूर हूँ मैं भी::जीने की यह रीती निकालें,तुम प्रेमी हो-प्रेम पसारो::मैं प्रेमी हूँ-जीवन वारूँ!!
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