निदा फ़ाज़ली

निदा फ़ाज़ली

1938-2016
मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली हिन्दी और उर्दू के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जायेघर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैंरुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वालाहमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद कियाबंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया
(शीला किणी के लिए)ये सच है
उठ के कपड़े बदलघर से बाहर निकल
सूरज एक नटखट बालक सादिन भर शोर मचाए
कच्चे बखिए की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैंहर नए मोड़ पर कुछ लोग बिछड़ जाते हैं
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मतसोच से ही सारी उलझन है जीते जाओ सोचो मत.
कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया हैजिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगेवो बदन जब भी सजे कोई नया ख्वाब लगे
कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहींमिला मुझको घर का पता देर से
किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करोकोई फ़ज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो.
कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत ना हुईजिसको चाहा उसे अपना ना सके जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ,याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ।
आओकहीं से थोड़ी सी मिट्टी भर लाएँ
चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिएहर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए
सरहदों पर फ़तह का ऐलान हो जाने के बादजंग!
जब किसी से कोई गिला रखनासामने अपने आईना रखना
जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दीसन्नाटों में आग लगा दी
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैंमेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं
ज़हानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिलाजिसे निगाह मिली उसको इंतज़ार मिला
जाने वालों से राब्ता रखनादोस्तो रस्म-ए-फातिहा रखना
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनियाबच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया.
जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना हैदो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है
तन्हा तन्हा हम रो लेंगे महफ़िल महफ़िल गायेंगेजब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे
तुम ये कैसे जुदा हो गयेहर तरफ़ हर जगह हो गये
तुम्हारी कब्र पर मैंफ़ातेहा पढ़ने नही आया,
तू इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल हैजहाँ भी जाऊँ ये लगता है तेरी महफ़िल है
तेरे पैरों चला नहीं जोधूप छाँव में ढला नहीं जो
तेरा हिज्र मेरा नसीब है तेरा ग़म ही मेरी हयात हैमुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों तू कहीं भी हो मेरे साथ है
हर कविता मुकम्मल होती हैलेकिन वह क़लम से काग़ज़ पर जब आती है
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रहीदोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही
दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलतीख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती
दीवार-ओ-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैंकोई नहीं बोलता जब तनहाइयाँ बोलती हैं