ग़ज़ल

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी

निदा फ़ाज़ली · सब कलाम देखें
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद कियाबंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया
खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों सेरंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों मेंछोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया
बात बहुत मामूली सी थी उलझ गई तकरारों मेंएक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बर्बाद किया
दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी हीसुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया
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