ग़ज़ल
थोड़ी सी कमी
हर कविता मुकम्मल होती हैलेकिन वह क़लम से काग़ज़ पर जब आती हैथोड़ी सी कमी रह जाती है
हर प्रीत मुकम्मल होती हैलेकिन वह गगन से धरती पर जब आती हैथोड़ी सी कमी रह जाती है
हर जीत मुकम्मल होती हैसरहद से वह लेकिन आँगन में जब आती हैथोड़ी सी कमी रह जाती है
फिर कविता नईफिर प्रीत नईफिर जीत नई बहलाती हैहर बार मगर लगता है यूँ हीथोड़ी सी कमी रह जाती है
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