ग़ज़ल
तेरा हिज्र मेरा नसीब है तेरा ग़म ही मेरी हयात है
तेरा हिज्र मेरा नसीब है तेरा ग़म ही मेरी हयात हैमुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों तू कहीं भी हो मेरे साथ है
मेरे वास्ते तेरे नाम पर कोई हर्फ़ आये नहीं नहींमुझे ख़ौफ़-ए-दुनिया नहीं मगर मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है
तेरा वस्ल ऐ मेरी दिलरुबा नहीं मेरी किस्मत तो क्या हुआमेरी महजबीं यही कम है क्या तेरी हसरतों का तो साथ है
तेरा इश्क़ मुझ पे है मेहरबाँ मेरे दिल को हासिल है दो जहाँमेरी जान-ए-जाँ इसी बात पर मेरी जान जाये तो बात है
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