ग़ज़ल
उठ के कपड़े बदल
उठ के कपड़े बदलघर से बाहर निकलजो हुआ सो हुआ॥
जब तलक साँस हैभूख है प्यास हैये ही इतिहास हैरख के कांधे पे हलखेत की ओर चलजो हुआ सो हुआ॥
खून से तर-ब-तरकर के हर राहगुज़रथक चुके जानवरलकड़ियों की तरहफिर से चूल्हे में जलजो हुआ सो हुआ॥
जो मरा क्यों मराजो जला क्यों जलाजो लुटा क्यों लुटामुद्दतों से हैं गुमइन सवालों के हलजो हुआ सो हुआ॥
मंदिरों में भजनमस्ज़िदों में अज़ाँआदमी है कहाँआदमी के लिएएक ताज़ा ग़ज़लजो हुआ सो हुआ।।
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