ग़ज़ल
कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहीं
कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहींमिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझेमगर जो दिया वो दिया देर से
हुआ न कोई काम मामूल सेगुज़ारे शब-ओ-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त परकभी घर में सूरज उगा देर से
कभी रुक गये राह में बेसबबकभी वक़्त से पहले घिर आई शब
हुये बंद दरवाज़े खुल खुल के सबजहाँ भी गया मैं गया देर से
ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल हैयही है जुदाई यही मेल है
मैं मुड़ मुड़ के देखा किया दूर तकबनी वो ख़ामोशी सदा देर से
सजा दिन भी रौशन हुई रात भीभरे जाम लहराई बरसात भी
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भीजो होना था जल्दी हुआ देर से
भटकती रही यूँ ही हर बंदगीमिली न कहीं से कोई रौशनी
छुपा था कहीं भीड़ में आदमीहुआ मुझ में रौशन ख़ुदा देर से
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