ग़ज़ल

तुम्हारी कब्र पर

निदा फ़ाज़ली · सब कलाम देखें
तुम्हारी कब्र पर मैंफ़ातेहा पढ़ने नही आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नही सकतेतुम्हारी मौत की सच्ची खबरजिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,वो तुम कब थे?कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।
मेरी आँखेतुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तकमैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँवो, वही हैजो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी ।
कहीं कुछ भी नहीं बदला,तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |
बदन में मेरे जितना भी लहू है,वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम |
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना |
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