मोमिन ख़ान मोमिन

मोमिन ख़ान मोमिन

1800-1852
मोमिन ख़ान मोमिन उर्दू के महान शायर थे जो अपनी रोमांटिक ग़ज़लों के लिए प्रसिद्ध हैं।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

'मोमिन' सू-ए-शर्क़ उस बुते-क़ाफ़िर का तो घर हैहम सिजदा किधर करते हैं और का'बा किधर है
अज़ल जाँ-ब-लब उसके शेवन से हैये नादिम मेरे ज़ूद-कुश्तन से है
असर उसको ज़रा नहीं होता ।रंज राहत-फिज़ा नहीं होता ।।
आहे-फ़लक-फ़ुग़न1 तेरे ग़म से कहाँ नहींजो फ़ितनाख़ेज़2 अब है ज़मीं आसमाँ नहीं
उलझे न ज़ुल्फ़ से जो परेशानियों में हमकरते हैं इसपे नाज़ अदा-दानियों1 में हम
ख़ुदा की याद दिलाते थे नज़अ1 में अहबाब2हज़ार शुक्र कि उस दम वह बदगु़माँ3 न हुआ
जलता हूँ हिज्र-ए-शाहिद-ओ-याद-ए-शराब में|शौक़-ए-सवाब ने मुझे डाला अज़ाब में|
जहाँ1 से शक्ल को तेरी तरस-तरस गुज़रेजो मुझपे बस न चला, अपने जी से बस गुज़रे
ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हमपर क्या करें कि हो गये नाचार जी से हम
डर तो मुझे किसका है के मैं कुछ नहीं कहता|पर हाल ये अफ़्शाँ है के मैं कुछ नहीं कहता|
तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहबकहीं साया मेरा पड़ा साहब
तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर लेहम तो कल ख्वाब-ए-अदम1 में शब-ए-हिजराँ2 होंगे
दफ़्न जब ख़ाक में हम सोख़्ता सामाँ होंगेफ़स्ल माही के गुल-ए-शम्अ-ए- शबिस्ताँ होंगे
दिन भी दराज़1 रात भी क्यों है फ़िराक़े-यार2 मेंकाहे से फ़र्क़ आ गया गर्दिशे-रोज़गार3 में
दिल क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ नहीं रहावो वलवला, वो जोश, वो तुग़याँ नहीं रहा
न कुछ शोख़ी1 चली बादे-सबा2 कीबिगड़ने में भी उसकी ज़ुल्फ़ बना की
न देना बोसा-ए-पा1 गो2 फ़लक झुकता ज़मीं पर हैकि यह उतना ज़मीं के नीचे है जितना ज़मीं पर है
मह्व1 मुझ-सा दमे-नज़्ज़ारा-ए-जानाँ2 होगाआईना आईन देखेगा तो हैराँ होगा
मार ही डाल मुझे चश्म-ए-अदा से पहले|अपनी मंज़िल को पहुँच जाऊं क़ज़ा से पहले|
मुझपे तूफ़ाँ उठाये लोगों नेमुफ़्त बैठे बिठाये लोगों ने
मुझे चुप लगी मुद्दआ1 कहते-कहतेरुके हैं वह क्या जाने क्या कहते-कहते
मैं एहवाल-ए-दिल मर गया कहते कहतेथके तुम न "बस, बस, सुना!" कहते कहते
ये हासिल है तो क्या हासिल बयाँ सेकहूँ कुछ और कुछ निकले ज़ुबाँ से
रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह,अटका कहीं जो आप का दिल भी मेरी तरह
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो|वही यानी वादा निभाने का तुम्हें याद हो के न याद हो|
शब-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त हमें क्या क्या मज़े दिखलाए था|दम रुके था सीने में कम्बख़्त जी घबराए था|
शब तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गये|खोये गये हम ऐसे के अग़्यार पा गये|
सब्रे-वहशत असर न हो जाएकहीं सहरा भी घर न हो जाए
हम समझते हैं आज़माने कोउज्र कुछ चाहिए सताने को
हरदम रहीने-कशमकशे-दस्ते-यार हैचिलमन के तार, किसके गरेबाँ का तार है