ग़ज़ल
शब-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त हमें क्या
शब-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त हमें क्या क्या मज़े दिखलाए था|दम रुके था सीने में कम्बख़्त जी घबराए था|
बल बे अय्यारी अदू के आगे वो पैमान शिकन,वादा-ए-वस्ल फिर करता था और शर्माए था|
सुन के मेरी मर्ग बोले मर गया अच्छा हुआ,क्या बुरा लगता था जिस दम सामने आ जाए था|
बात शब को उस के मना-ए-बेक़रारी से बड़ी,हम तो समझे और कुछ वो और कुछ समझाए था|
कोई दिन तो उस पे क्या तस्वीर का आलम रहा,हर कोई हैरत का पुतला देख कर बन जाए था|
सू-ए-सहरा ले चले उस कू से मेरी नाश हाए,था यही दर इन दिनों तलवा मेरा खुजलाए था|
हो गई दो रोज़ की उल्फ़त में क्या हालत अभी,"मोमिन"-ए-वहशी को देखा इस तरफ़ से जाए था|
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