ग़ज़ल
सब्रे-वहशत असर न हो जाए
सब्रे-वहशत असर न हो जाएकहीं सहरा भी घर न हो जाए
हिज्रे-परदानशीं1 में मरते हैंज़िन्दगी परदा-दर2 न हो जाए
कसरते-सिजदा3 से वह नक़्शे-क़दम4कहीं पामाल-सर5 न हो जाए
मेरे तग़य्युरे-रंग6 को मत देखतुझको अपनी नज़र न हो जाए
मेरे आँसू न पोंछना देखोकहीं दामान-तर7 न हो जाए
बात नासेह से करते डरता हूँकि फ़ुग़ाँ8 बे-असर न हो जाए
ऐ क़यामत न आइयो जब तकवह मेरी गोर न हो जाए
मनअ-ए-ज़ुल्म9 है तग़ाफ़ुले-यार10बख़्त-बद11 को ख़बर न हो जाए
ग़ैर से बेहिजाब मिलते होशबे-आशिक़11 सहर12 न हो जाए
ऐ दिल, आहिस्ता आह-ताबे-शिकन13देख टुकड़े जिगर न हो जाए
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