ग़ज़ल
असर उसको ज़रा नहीं होता
असर उसको ज़रा नहीं होता ।रंज राहत-फिज़ा नहीं होता ।।
बेवफा कहने की शिकायत है,तो भी वादा वफा नहीं होता ।
जिक़्रे-अग़ियार से हुआ मालूम,हर्फ़े-नासेह बुरा नहीं होता ।
तुम हमारे किसी तरह न हुए,वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता ।
उसने क्या जाने क्या किया लेकर,दिल किसी काम का नहीं होता ।
नारसाई से दम रुके तो रुके,मैं किसी से खफ़ा नहीं होता ।
तुम मेरे पास होते हो गोया,जब कोई दूसरा नहीं होता ।
हाले-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर,हाथ दिल से जुदा नहीं होता ।
क्यूं सुने अर्ज़े-मुज़तर ऐ ‘मोमिन’सनम आख़िर ख़ुदा नहीं होता ।
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