ग़ज़ल

दिन भी दराज़ रात भी क्यों है फ़िराके-यार में

मोमिन ख़ाँ मोमिन · सब कलाम देखें
दिन भी दराज़1 रात भी क्यों है फ़िराक़े-यार2 मेंकाहे से फ़र्क़ आ गया गर्दिशे-रोज़गार3 में
ख़ाक में वह तपिश4 नहीं ख़ार में वह ख़लिश5 नहींक्यों न हमें ज़्यादा हो जोशे-जुनूँ6 बहार में
मर्ग7 है इन्तिहा-ए-इश्क़8 याँ रही इब्तिदा-ए-शौक़9ज़िन्दगी अपनी हो गयी रंजिशे बार-बार में
ख़ाक उड़ायी गुल ने यह किसके जुनूने-इश्क़ मेंआये हैं कुछ अटी हुई बादे-सबा10 ग़ुबार में
ध्यान में 'मोमिन' आ गयी बहसे-जब्रओ-इख़्तियार11क़ाबू-ए-यार में हैं हम, वह नहीं इख़्तियार में
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