ग़ज़ल
न कुछ शोख़ी चली बादे-सबा की
न कुछ शोख़ी1 चली बादे-सबा2 कीबिगड़ने में भी उसकी ज़ुल्फ़ बना की
कभी इंसाफ़ ही देखा न दीदार3क़यामत अक़्सर उस कू4 में रहा की
फ़लक़5 के हाथ से मैं जा छिपूँ गरख़बर ला दे कोई तहतुलसरा6 की
शबे-वस्ले-अदू7 क्या-क्या जला हूँहक़ीक़त खुल गयी रोज़े-जज़ा8 की
चमन में कोई उस कू से न आयागयी बरबाद सब मेहनत सबा की
कशीदे-दिल9 पे बाँधी है कमर आजनहीं ख़ैर10 आपके बन्दे-क़बा11 की
किया जब इल्तिफ़ात12 उसने ज़रा-सापड़ी हमको हुसूले-मुद्दआ13 की
कहा है ग़ैर ने तुमसे मेरा हालकहे देती है बेबाकी14 अदा की
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