ग़ज़ल
मह्व मुझ-सा दमे-नज़्ज़ारा-ए-जानाँ होगा
मह्व1 मुझ-सा दमे-नज़्ज़ारा-ए-जानाँ2 होगाआईना आईन देखेगा तो हैराँ होगा
ऐसी लज़्ज़त3 ख़लिशे-दिल4 में कहाँ होती हैरह गया सीने में उसका कोई पैकाँ5 होगा
बोसा-हाये-लबे-शीरीं6 के मज़ामीं7 में न क्योंलफ़ज़ से लफ़्ज़8 मेरे शे'र की चस्पाँ9 होगा
कह सुनाते हो कि है हिज्र में जीना मुश्किलतुमसे बेरहम पे मरने से तो एहसाँ होगा
क्योंकर उम्मीदे-वफ़ा10 से हो तसल्ली दिल कोफ़िक्र है यह कि वह वादे से पशेमाँ11 होगा
आख़िर उम्मीद सी से चारा-ए-हरमाँ12 होगामर्ग13 की आस पे जीना शबे-हिज्राँ होगा
बात करने में रक़ीबाँ14 से अभी टूट गयादिल भी शायद उसी बद्-अहद15 का पैमाँ होगा
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