ग़ज़ल
'मोमिन' सू-ए-शर्क़ उस बुते-क़ाफ़िर का तो घर है
'मोमिन' सू-ए-शर्क़ उस बुते-क़ाफ़िर का तो घर हैहम सिजदा किधर करते हैं और का'बा किधर है
हसरत अगर मैं देखूँ तो फ़लक़ क्योंकर न हो रामउस नरगिसे-जादू को निगह पेशे-नज़र है
ख़त की मुझे क़ासिद को है ईनाम की ख़ाहिशमैं दस्तनिगर1 ख़ुद हूँ, वह क्या दस्तनिगर है
अरमान निकलने दे बस ऐ बीमे-नज़ाकत2हाँ हाथ तसव्वुर में मेरा ज़ेरे-कमर है
रिन्दों पे यह बेदाद ख़ुदा से नहीं डरताऐ मुहतसिब ऐसा तुझे क्या शाह का डर है
ऐसे दमे-आराम असर-ख़ुफ़्ता3 कब उठाहमको अबस उम्मीद दुआहाए-सहर है
हम हाल कहे जायेंगे सुनिये कि न सुनियेइतना ही तो याँ सुहबते-नासेह का असर है
वह ज़िबह करें और यहाँ जान फ़िदा होऐसे से निभे यूँ यह हमारा ही जिगर है
अब नहीं जाती तेरे आ जाने की उम्मीदगो फिर गयीं आँखें पर निगाह जानिबे-दर है
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