ग़ज़ल
डर तो मुझे किसका है के मैं कुछ नहीं कहता
डर तो मुझे किसका है के मैं कुछ नहीं कहता|पर हाल ये अफ़्शाँ है के मैं कुछ नहीं कहता|
नासेह ये गिला है के मैं कुछ नहीं कहता,तू कब मेरी सुनता है के मैं कुछ नहीं कहता|
कुछ ग़ैर से होंठों में कहे है जो पूछो,तो वहीं मुकरता है के मैं कुछ नहीं कहता|
नासेह को जो चाहूँ तो अभी ठीक बना दूँ,पर ख़ौफ़ ख़ुदा का है के मैं कुछ नहीं कहता|
चुपके से तेरे मिलने का घर वालों में तेरे,इस वास्ते चर्चा है के मैं कुछ नहीं कहता|
ऐ चारागरो क़बिल-ए-दरमाँ नहीं ये दर्द,वर्ना मुझे सौदा है के मैं कुछ नहीं कहता|
हर वक़्त है दुश्नाम हर एक बात पे ताना,फिर इस पे भी कहता है के मैं कुछ नहीं कहता|
"मोमिन" बा-ख़ुदा सिहर बयानी का जभी तक,हर एक को दावा है के मैं कुछ नहीं कहता|
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