ग़ज़ल
जलता हूँ हिज्र-ए-शाहिद-ओ-याद-ए-शराब में
जलता हूँ हिज्र-ए-शाहिद-ओ-याद-ए-शराब में|शौक़-ए-सवाब ने मुझे डाला अज़ाब में|
कहते हैं तुम को होश नहीं इज़्तराब में,सारे गिले तमाम हुए एक जवाब में|
फैली शमीम-ए-यार मेरे अश्क-ए-सुर्ख़ से,दिल को ग़ज़ब फ़िशार हुआ पेच-ओ-ताब में|
रहते हैं जमा कूचा-ए-जानाँ में ख़ास-ओ-आम,आबाद एक घर है जहान-ए-ख़राब में|
बदनाम मेरे गिरिया-ए-रुसवा से हो चुके,अब उज़्र क्या रहा निगाह-ए-बेहिजाब में|
मतलब की जुस्तजू ने ये क्या हाल कर दिया,हसरत भी नहीं दिल-ए-नाकामयाब में|
नाकामियों से काम रहा उम्र भर हमें,पिरी में यास है जो हवस थी शबाब में|
क्या जलवे याद आये के अपनी ख़बर नहीं,बे-बादा मस्त हूँ मैं शब-ए-माहताब में|
पैहम सजूद पा-ए-सनम पर दम-ए-विदा,"मोमिन" ख़ुदा को भूल गये इज़्तराब में|
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