ग़ज़ल
दिल क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ नहीं रहा
दिल क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ नहीं रहावो वलवला, वो जोश, वो तुग़याँ नहीं रहा
करते हैं अपने ज़ख़्म-ए-जिगर को रफ़ू हम आपकुछ भी ख़्याल-ए-जुम्बिश-ए-मिज़गाँ नहीं रहा
क्या अच्छे हो गए कि भलों से बुरे हुएयारों को फ़िक्र-ए-चारा-ओ-दरमाँ नही रहा
किस काम के रहे जो किसी से रहा न कामसर है मगर ग़ुरूर का सामाँ नहीं रहा
मोमिन ये लाफ़-ए-उलफ़त-ए-तक़वा है क्यों अबसदिल्ली में कोई दुश्मन-ए-ईमाँ नहीं रहा
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