ग़ज़ल
तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहब
तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहबकहीं साया मेरा पड़ा साहब
है ये बन्दा ही बेवफ़ा साहबग़ैर और तुम भले भला साहब
क्यों उलझते हो जुम्बिशे-लब सेख़ैर है मैंने क्या कहा साहब
क्यों लगे देने ख़त्ते-आज़ादीकुछ गुनह भी ग़ुलाम का साहब
दमे-आख़िर भी तुम नहीं आतेबन्दगी अब कि मैं चला साहब
सितम, आज़ार, ज़ुल्म, जोरो-जफ़ाजो किया सो भला किया साहब
किससे बिगड़े थे,किसपे ग़ुस्सा थेरात तुम किसपे थे ख़फ़ा साहब
किसको देते थे गालियाँ लाखोंकिसका शब ज़िक्रे-ख़ैर था साहब
नामे-इश्क़े-बुताँ न लो 'मोमिन'कीजिए बस ख़ुदा-ख़ुदा साहब
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh