ग़ज़ल
जहाँ से शक्ल को तेरी तरस-तरस गुज़रे
जहाँ1 से शक्ल को तेरी तरस-तरस गुज़रेजो मुझपे बस न चला, अपने जी से बस गुज़रे
बनी है सूरे-सराफ़ील2 आह बे-तासीरकि मेरे सम पे क़यामत नफ़स-नफ़स3 गुज़रे
न जाऊँ क्योंकि सू-ए-दाम4 आशियाँ से जबख़याले-हसरते मुर्ग़ाने-हमक़फ़स5 गुज़रे
हो और को तो हिदायत, जोख़ुद हूँ आवारायह उम्र काश कि जूँ नाला-ए-जरस6 गुज़रे
कहाँ वह रब्ते-बुताँ7 अब कि उसको तो 'मोमिन'हज़ार साल हुए सैकड़ों बरस गुज़रे
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