महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा

1907-1987
महादेवी वर्मा हिन्दी छायावाद की प्रमुख कवयित्री थीं, जिन्हें "आधुनिक मीरा" कहा जाता है। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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Famous Works

वे मुस्काते फूल, नहींजिनको आता है मुर्झाना,
आँधी आई जोर शोर से,डालें टूटी हैं झकोर से।
अलि, मैं कण-कण को जान चलीसबका क्रन्दन पहचान चली
अलि अब सपने की बात-हो गया है वह मधु का प्रात!
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है!यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये,
आओ, प्यारे तारो आओतुम्हें झुलाऊँगी झूले में,
शलभ मैं शपमय वर हूँ!किसी का दीप निष्ठुर हूँ!
डाल हिलाकर आम बुलातातब कोयल आती है।
कौन तुम मेरे हृदय में?कौन मेरी कसक में नित
क्या जलने की रीति शलभ समझा दीपक जानाघेरे हैं बंदी दीपक को
क्या पूजन क्या अर्चन रे!उस असीम का सुंदर मंदिर मेरा लघुतम जीवन रे!
क्यों इन तारों को उलझाते?अनजाने ही प्राणों में क्यों
जब यह दीप थके तब आना।यह चंचल सपने भोले है,
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!जाग तुझको दूर जाना!
जाने किस जीवन की सुधि लेलहराती आती मधु-बयार!
किन उपकरणों का दीपक,किसका जलता है तेल?
जो तुम आ जाते एक बारकितनी करूणा कितने संदेश
जो मुखरित कर जाती थींमेरा नीरव आवाहन,
ठंडे पानी से नहलातीं,ठंडा चंदन इन्हें लगातीं,
मेह बरसने वाला हैमेरी खिड़की में आ जा तितली।
दीप मेरे जल अकम्पित,घुल अचंचल!
दीपक अब रजनी जाती रेजिनके पाषाणी शापों के
यह महादेवी वर्मा जी की अत्यन्त प्रसिद्ध चित्र-गीतात्मक पुस्तक है जिसमें महादेवीजी ने अपनी कवितायें अपने बनाये चित्रों पर स्वयम् लिखी थीं। यह काव्य संग्रह 1942 में प्रकाशित हुआ था। इसमें कुल इक्यावन कविताएँ हैं. प्रत्येक गीत अनूठा एवम् चित्रात्मक है.जो स्थान महाकाव्यों में प्रसादजी की 'कामायनी' एवम् प्रबंधात्मक कविताओं में निरालाजी की 'राम की शक्ति पूजा' को प्राप्त है, वही स्थान आधुनिक गीतिकाव्य में 'दीपशिखा' को प्राप्त है. आधुनिक काव्य में श्रेष्ठ है गीतिकाव्य, गीतिकाव्य में श्रेष्ठ हैं महादेवी के गीत, एवम् महदेवीजी के गीतों में श्रेष्ठ है 'दीपशिखा'!
धूप सा तन दीप सी मैं!उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन,
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
पूछता क्यों शेष कितनी रात?छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तू
प्रिय चिरंतन है सजनि,क्षण-क्षण नवीन सुहासिनी मै!
मधुरिमा के, मधु के अवतारसुधा से, सुषमा से, छविमान,
बताता जा रे अभिमानी!कण-कण उर्वर करते लोचन
बया हमारी चिड़िया रानी!तिनके लाकर महल बनाती,
बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में,
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
मेरा सजल मुख देख लेते!यह करुण मुख देख लेता!
मै अनंत पथ में लिखती जोसस्मित सपनों की बाते