ग़ज़ल
प्रिय चिरन्तन है
प्रिय चिरंतन है सजनि,क्षण-क्षण नवीन सुहासिनी मै!
श्वास में मुझको छिपाकर वह असीम विशाल चिर घनशून्य में जब छा गया उसकी सजीली साध-सा बन,छिप कहाँ उसमें सकीबुझ-बुझ जली चल दामिनी मैं।
छाँह को उसकी सजनि, नव आवरण अपना बनाकरधूलि में निज अश्रु बोने में पहर सूने बिताकर,प्रात में हँस छिप गईले छलकते दृग-यामिनी मै!
मिलन-मन्दिर में उठा दूँ जो सुमुख से सजल गुण्ठन,मैं मिटूँ प्रिय में, मिटा ज्यों तप्त सिकता में सलिल कण,सजनि! मधुर निजत्व देकैसे मिलूँ अभिमानिनी मैं!
दीप-सी युग-युग जलूँ पर वह सुभग इतना बता देफूँक से उसकी बुझूँ तब क्षार ही मेरा पता दे!वह रहे आराध्य चिन्मयमृण्मयी अनुरागिनी मैं!
सजल सीमित पुतलियाँ, पर चित्र अमिट असीम का वहचाह एक अनन्त बसती प्राण किन्तु असीम-सा वह!रजकणों में खेलती किसविरज विधु की चाँदनी मैं?
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