ग़ज़ल

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!

महादेवी वर्मा · सब कलाम देखें
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपलप्रियतम का पथ आलोकित कर!
सौरभ फैला विपुल धूप बनमृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,तेरे जीवन का अणु गल-गलपुलक-पुलक मेरे दीपक जल!
तारे शीतल कोमल नूतनमाँग रहे तुझसे ज्वाला कण;विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैंहाय, न जल पाया तुझमें मिल!सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!
जलते नभ में देख असंख्यकस्नेह-हीन नित कितने दीपकजलमय सागर का उर जलता;विद्युत ले घिरता है बादल!विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!
द्रुम के अंग हरित कोमलतमज्वाला को करते हृदयंगमवसुधा के जड़ अन्तर में भीबन्दी है तापों की हलचल;बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!
मेरे निस्वासों से द्रुततर,सुभग न तू बुझने का भय कर।मैं अंचल की ओट किये हूँ!अपनी मृदु पलकों से चंचलसहज-सहज मेरे दीपक जल!
सीमा ही लघुता का बन्धनहै अनादि तू मत घड़ियाँ गिनमैं दृग के अक्षय कोषों से-तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!सहज-सहज मेरे दीपक जल!
तुम असीम तेरा प्रकाश चिरखेलेंगे नव खेल निरन्तर,तम के अणु-अणु में विद्युत-साअमिट चित्र अंकित करता चल,सरल-सरल मेरे दीपक जल!
तू जल-जल जितना होता क्षय;यह समीप आता छलनामय;मधुर मिलन में मिट जाना तूउसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!प्रियतम का पथ आलोकित कर!
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