ग़ज़ल
बताता जा रे अभिमानी!
बताता जा रे अभिमानी!
कण-कण उर्वर करते लोचनस्पन्दन भर देता सूनापनजग का धन मेरा दुख निर्धनतेरे वैभव की भिक्षुक याकहलाऊँ रानी!बताता जा रे अभिमानी!
दीपक-सा जलता अन्तस्तलसंचित कर आँसू के बादललिपटी है इससे प्रलयानिल,क्या यह दीप जलेगा तुझसेभर हिम का पानी?बताता जा रे अभिमानी!
चाहा था तुझमें मिटना भरदे डाला बनना मिट-मिटकरयह अभिशाप दिया है या वर;पहली मिलन कथा हूँ या मैंचिर-विरह कहानी!बताता जा रे अभिमानी!
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