ग़ज़ल
किसी का दीप निष्ठुर हूँ
शलभ मैं शपमय वर हूँ!किसी का दीप निष्ठुर हूँ!
ताज है जलती शिखा;चिनगारियाँ शृंगारमाला;ज्वाल अक्षय कोष सीअंगार मेरी रंगशाला ;नाश में जीवित किसी की साध सुन्दर हूँ!
नयन में रह किन्तु जलतीपुतलियाँ आगार होंगी;प्राण में कैसे बसाऊँकठिन अग्नि समाधि होगी;
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