ग़ज़ल
दीपक अब रजनी जाती रे
दीपक अब रजनी जाती रे
जिनके पाषाणी शापों केतूने जल जल बंध गलाएरंगों की मूठें तारों केखील वारती आज दिशाएँतेरी खोई साँस विभा बनभू से नभ तक लहराती रेदीपक अब रजनी जाती रे
लौ की कोमल दीप्त अनी सेतम की एक अरूप शिला परतू ने दिन के रूप गढ़े शतज्वाला की रेखा अंकित करअपनी कृति में आजअमरता पाने की बेला आती रेदीपक अब रजनी जाती रे
धरती ने हर कण सौंपाउच्छवास शून्य विस्तार गगन मेंन्यास रहे आकार धरोहरस्पंदन की सौंपी जीवन रेअंगारों के तीर्थ स्वर्ण करलौटा दे सबकी थाती रेदीपक अब रजनी जाती रे
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