ग़ज़ल

क्या जलने की रीत

महादेवी वर्मा · सब कलाम देखें
क्या जलने की रीति शलभ समझा दीपक जाना
घेरे हैं बंदी दीपक कोज्वाला की वेलादीन शलभ भी दीप शिखा सेसिर धुन धुन खेलाइसको क्षण संताप भोर उसको भी बुझ जाना
इसके झुलसे पंख धूम कीउसके रेख रहीइसमें वह उन्माद न उसमेंज्वाला शेष रहीजग इसको चिर तृप्त कहे या समझे पछताना
प्रिय मेरा चिर दीप जिसे छूजल उठता जीवनदीपक का आलोक शलभका भी इसमें क्रंदनयुग युग जल निष्कंप इसे जलने का वर पाना
धूम कहाँ विद्युत लहरों सेहैं निश्वास भराझंझा की कंपन देतीचिर जागृति का पहराजाना उज्जवल प्रात न यह काली निशि पहचाना
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