ग़ज़ल
जो मुखरित कर जाती थीं
जो मुखरित कर जाती थींमेरा नीरव आवाहन,मैं नें दुर्बल प्राणों कीवह आज सुला दी कंपन!थिरकन अपनी पुतली कीभारी पलकों में बाँधीनिस्पंद पड़ी हैं आँखेंबरसाने वाली आँधी!
जिसके निष्फल जीवन नेंजल जल कर देखी राहेंनिर्वाण हुआ है देखोवह दीप लुटा कर चाहें!निर्घोष घटाओं में छिपतड़पन चपला सी सोतीझंझा के उन्मादों मेंघुलती जाती बेहोशी!
करुणामय को भाता हैतम के परदों में आनाहे नभ की दीपावलियों!तुम पल भर को बुझ जाना!
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