ग़ज़ल
धूप सा तन दीप सी मैं
धूप सा तन दीप सी मैं!
उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन,खो रहा निज को अथक आलोक-सांसों में पिघल मनअश्रु से गीला सृजन-पल,औ' विसर्जन पुलक-उज्ज्वल,आ रही अविराम मिट मिटस्वजन ओर समीप सी मैं!
सघन घन का चल तुरंगम चक्र झंझा के बनाये,रश्मि विद्युत ले प्रलय-रथ पर भले तुम श्रान्त आये,पंथ में मृदु स्वेद-कण चुन,छांह से भर प्राण उन्मन,तम-जलधि में नेह का मोतीरचूंगी सीप सी मैं!
धूप-सा तन दीप सी मैं!
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh