सुमित्रानंदन पंत
1900-1977
सुमित्रानंदन पंत हिन्दी छायावाद के प्रमुख स्तंभ कवि थे, जिन्हें प्रकृति-सौंदर्य के चित्रण और ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए जाना जाता है।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
अँधियाली घाटी में सहसा
हरित स्फुलिंग सदृश फूटा वह!
तुम आती हो,
नव अंगों का
खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!
बंधन बन रही अहिंसा आज जनों के हित,
वह मनुजोचित निश्चित, कब? जब जन हों विकसित।
मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रोमांचित हो उठे आज नव वर्षा के स्पर्शों से?
छोटे से आँगन मेरे, तुम रीते थे वर्षों से!
आओ, अपने मन को टोवें!
व्यर्थ देह के सँग मन की भी
पैगम्बर के एक शिष्य ने
पूछा, 'हजरत बंदे को शक
क्या मेरी आत्मा का चिर-धन ?
मैं रहता नित उन्मन, उन्मन !
पशुओं से मृदु चर्म, पक्षियों से ले प्रिय रोमिल पर,
ऋतु कुसुमों से सुरँग सुरुचिमय चित्र वस्त्र ले सुंदर,
:खोलो वासना के वसन,
::नारी नर!
::तुम भाव प्रवण हो।
जीवन पिय हो, सहनशील सहृदय हो, कोमल मन हो।
जोतो हे कवि, निज प्रतिभा के
:फल से निष्ठुर मानव अंतर,
रंग रंग के चीरों से भर अंग, चीरवासा-से,
दैन्य शून्य में अप्रतिहत जीवन की अभिलाषा-से,
सुनता हूँ, मैंने भी देखा,
काले बादल में रहती चाँदी की रेखा!
पूस: निशा का प्रथम प्रहर: खिड़की से बाहर
दूर क्षितिज तक स्तब्ध आम्र वन सोया: क्षण भर
अब आधा जल निश्चल, पीला,--
आधा जल चंचल औ’, नीला--
शय्या ग्रस्त रहा मैं दो दिन, फूलदान में हँसमुख
चंद्र मल्लिका के फूलों को रहा देखता सन्मुख।
::राम राम,
:हे ग्राम देवता, भूति ग्राम !
फैली खेतों में दूर तलक
:मख़मल की कोमल हरियाली,
नभ की है उस नीली चुप्पी पर
घंटा है एक टंगा सुन्दर,
अररर.......
मचा खूब हुल्लड़ हुड़दंग,
:भ्रम, भ्रम, भ्रम,--
घूम घूम भ्रम भ्रम रे चरख़ा
चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,
जय जन भारत जन मन अभिमत
जय जन भारत जन मन अभिमत
जीना अपने ही में
एक महान कर्म है
तप रे, मधुर मन!
विश्व-वेदना में तप प्रतिपल,
नीली, पीली औ’ चटकीली
पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल,
दिन की इस विस्तृत आभा में, खुली नाव पर,
आर पार के दृश्य लग रहे साधारणतर।
मेरे आँगन में, (टीले पर है मेरा घर)
दो छोटे-से लड़के आ जाते है अकसर !
धिक रे मनुष्य, तुम स्वच्छ, स्वस्थ, निश्छल चुंबन
अंकित कर सकते नहीं प्रिया के अधरों पर?
द्वाभा के एकाकी प्रेमी,
नीरव दिगन्त के शब्द मौन,
धरती का आँगन इठलाता!
शस्य श्यामला भू का यौवन
एक धूप का हँसमुख टुकड़ा
तरु के हरे झरोखे से झर