ग़ज़ल
चमारों का नाच
अररर.......मचा खूब हुल्लड़ हुड़दंग,धमक धमाधम रहा मृदंग,उछल कूद, बकवाद, झड़प मेंखेल रही खुल हृदय उमंगयह चमार चौदस का ढंग।
ठनक कसावर रहा ठनाठन,थिरक चमारिन रही छनाछन,झूम झूम बाँसुरी करिंगाबजा रहा बेसुध सब हरिजन,गीत नृत्य के सँग है प्रहसन!
मजलिस का मसख़रा करिंगाबना हुआ है रंग बिरंगा,भरे चिरकुटों से वह सारीदेह हँसाता खूब लफंगा,स्वाँग युद्ध का रच बेढंगा!
बँधा चाम का तवा पीठ पर,पहुँचे पर बद्धी का हंटर,लिये हाथ में ढ़ाल, टेड़हीदुमुहा सी बलखाई सुन्दर—इतराता वह बन मुरलीधर!
ज़मीदार पर फबती कसता,बाम्हन ठाकुर पर है हँसता,बालों में वक्रोक्ति काकु औ’श्लेश बोल जाता वह सस्ता,कल काँटा को कह कलकत्ता।
घमासान हो रहा है समर,उसे बुलाने आये अफ़सर,गोला फट कर आँख उड़ा दे,छिपा हुआ वह, उसे यही डर,खौफ़ न मरने का रत्ती भर।
काका, उसका है साथी नट,गदके उस पर जमा पटापट,उसे टोकता,—गोली खाकरआँख जायगी, क्यों बे नटखट?भुन न जायगा भुनगे सा झट?’
गोली खाई ही हैं!’ ’चल हट!’’कई—भाँग की!’ वाः, मेरे भट!’’सच काका!’ भगवान रामसीसे की गोली!’ ’रामधे?’ ’विकट!’गदका उस पर पड़ता चटपट।
वह भी फ़ौरन बद्धी कसकरकाका को देता प्रत्युतर,खेत रह गए जब सब रण मेंतब वह निधड़क, गुस्से में भर,लड़ने को निकला था बाहर!
लट्टू उसके गुन पर हरिजन,छेड़ रहा वंशी फिर मोहन,तिरछी चितवन से जन मन हरइठला रही चमारिन छन छन,ठनक कसावर बजता ठन ठन!
ये समाज के नीच अधम जन,नाच कूद कर बहलाते मन,वर्णों के पद दलित चरण येमिटा रहे निज कसक औ’ कुढ़नकर उच्छृंखलता, उद्धतपन।
अररर..........शोर, हँसी, हुल्लड़, हुड़दंग,धमक रहा धाग्ड़ांग मृदंग,मार पीट बकवास झड़प मेंरंग दिखाती महुआ, भंगयह चमार चौदस का ढंग!
रचनाकाल: जनवरी’ ४०
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