ग़ज़ल

चरख़ा गीत

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
:भ्रम, भ्रम, भ्रम,--घूम घूम भ्रम भ्रम रे चरख़ाकहता: ’मैं जन का परम सखा,जीवन का सीधा सा नुसख़ा—:श्रम, श्रम, श्रम!’
कहता: ’हे अगणित दरिद्रगण!जिनके पास न अन्न, धन, वसन,मैं जीवन उन्नति का साधन-:क्रम, क्रम, क्रम!’
:भ्रम, भ्रम, भ्रम,--’धुन रुई, निर्धनता दो धुन,कात सूत, जीवन पट लो बुन;अकर्मण्य, सिर मत धुन, मत धुन,:थम, थम, थम!’
’नग्न गात यदि भारत मा का,तो खादी समृद्धि की राका,हरो देश की दरिद्रता का:तम, तम, तम!’
:भ्रम, भ्रम, भ्रम,--कहता चरख़ा प्रजातंत्र से;’मैं कामद हूँ सभी मंत्र से’;कहता हँस आधुनिक यंत्र से,:’नम, नम, नम!’
’सेवक पालक शोषित जन का,रक्षक मैं स्वदेश के धन का,कातो हे, काटो तन मन का:भ्रम, भ्रम, भ्रम,--
रचनाकाल: दिसंबर’ ३९
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