ग़ज़ल
अँधियाली घाटी में
अँधियाली घाटी में सहसाहरित स्फुलिंग सदृश फूटा वह!वह उड़ता दीपक निशीथ का,--तारा-सा आकर टूटा वह!::जीवन के इस अन्धकार में::मानव-आत्मा का प्रकाश-कण::जग सहसा, ज्योतित कर देता::मानस के चिर गुह्य कुंज-वन!
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