ग़ज़ल

आजाद

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
पैगम्बर के एक शिष्य नेपूछा, 'हजरत बंदे को शकहै आजाद कहां तक इंसादुनिया में,पाबंद कहां तक?'
'खड़े रहो!' बोले रसूल तब,'अच्छा, पैर उठाओ उपर''जैस हुक्मा!' मुरीद सामनेखड़ा हो गया एक पैर पर!
'ठीक , दूसरा पैर उठाओ 'बोले हंस कर नबी फिर तुरत,बार बार गिर, कहा शिष्य ने'यह तो नामुमकिन है हजरत'
'हो आजाद यहां तक, कहतातुमसे एक पैर उठ उपर,बंधे हुए दुनिया से, कहतापैर दूसरा अड़ा जमीं पर!' -पैगम्बसर का था यह उत्तर!
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