ग़ज़ल
आ: धरती कितना देती है
मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थेसोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।
मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।
अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजानेग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाईसी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।
औ' जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लियेगहरे कजरारे बादल बरसे धरती परमैने कौतूहलवश आँगन के कोने कीगीली तह को यों ही उँगली से सहलाकरबीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।
मै फिर भूल गया था छोटी से घटना कोऔर बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मेटहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।
देखा आँगन के कोने मे कई नवागतछोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी -जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरेपंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थेडिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।
निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मेऔर उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटनमेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।
तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरेअनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँहरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवेबेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहराऔर सहारा लेकर बाड़े की टट्टी काहरे हरे सौ झरने फूट ऊपर कोमै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है
यह धरती कितना देती है । धरती माताकितना देती है अपने प्यारे पुत्रो कोनहीं समझ पाया था मै उसके महत्व कोबचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।इसमे सच्ची समता के दाने बोने हैइसमे जन की क्षमता के दाने बोने हैइसमे मानव ममता के दाने बोने हैजिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलेमानवता की - जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएंहम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।
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